Knowledge of soul -motivational thoughts 6

आत्मा का ज्ञान

अध्यात्म और समाज आज के वर्तमान परिवेश में अध्यात्म अर्थात आत्मा का ज्ञान जैसा विषय निरर्थक सी सोच जान पड़ता है। इतनी प्रौद्योगिकी, बुद्धि-संपन्नता, असीमित सफलताओं के होने पर भी आज हम कैसे समाज को देख रहे हैं? बहुत तेजी से अपनी संस्कृति, चिंतन, श्रद्धा आदि जैसे संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं।

 

सब कुछ होते हुए भी हम संभवतः आत्मा के ज्ञान से अपरिचित होते जा रहे हैं। ऐसे में घर और शिक्षण संस्थाओं में बाल्यकाल से ही आध्यात्मिक आदशों पर चलने का चलन अनिवार्य होना अति आवश्यक होता जा रहा है जो बालक के मानसिक स्तर का हो सच तो यह है कि किसी भी प्रकार का दंड सामाजिक अपराधी को सुधार के मार्ग पर नहीं ला सकता। न ही उसका उदाहरण दूसरे आपराधिक तत्वों में डर पैदा कर पाने में सक्षम होता दिख रहा है।

इसी कारण देश का कोई भी कानुन ऐसी कुरीतियों का जड़ से उन्मूलन नहीं कर पा रहा है। समस्या यह है कि भटके हुए लोग न तो ज्ञानवर्धक बातें सुनते हैं, न पढ़ते हैं, आध्यात्मिक परिचर्चा तो दूर की बात है। उनका पारिवारिक व सामाजिक वातावरण भी संवेदनशील नहीं होता। सामान्यतः देखा गया है कि अपराधी अपने जीवन की राह में कहीं न कहीं भटका हुआ होता है, हृदय में कोई तीव्र कुठा पाले अपने अंदर क्रोध, बदले की अग्नि में आहुति देता रहता है। उसे कोई सही राह दिखाने वाला चाहिए जो उसका विश्वास जीत सके।

अंततः यह कहना अनुचित न होगा कि सामाजिक कुरीतियों का निवारण केवल और केवल आध्यात्मिक ज्ञान में ही निहित है।हम जागरूक समाज के तबके का यह उत्तरदायित्व बनता है कि अपने चारों ओर फैली कुरीतियों का निवारण करने के लिए चिंतन-मनन करें, कुछ अपने स्तर पर अपने से कम भाग्यशाली लोगों को स्वयं से जोड़ें। धीरे-धीरे उन्हें अध्यात्म की महत्ता से परिचित कराएं।

हमारे मीडियाकर्मी, फिल्म जगत से जुड़े लोग इस दिशा में । अभूतपूर्व व व्यक्तिगत रूप से सहयोग कर सकते हैं। यदि हम दो-चार राह-भूले लोगों को सही मार्ग दिखा पाएं तो भी पर्याप्त है। प्रत्येक कठिन कार्य में अड़चनें आती हैं, समय भी लगता है, परंतु सच्चे मन से किया कार्य सफलता पा ही लेता है। आवश्यकता है एक सोच की, संवेदना की, एक निःस्वार्थ प्रयास की।

छाया श्रीवास्तव 

Knowledge of soul -motivational thoughts 6
Knowledge of soul

 

Knowledge of soul

Spirituality and Society In today’s present environment, the subject of spiritual knowledge, ie knowledge of the soul, seems worthless thinking. Even though we have so much technology, intellectuals, unlimited successes, how are we looking at society today? Sanskars such as its culture, contemplation and reverence are being lost very fast. Even after all, we are probably becoming unfamiliar with the knowledge of the soul.

 

In such a way, the practice of walking on spiritual principles from childhood in the home and educational institutions is becoming more and more essential, which is of the mental level of the child. It is true that any kind of punishment does not bring the social criminal on the path of reform can. Neither its example seems to be able to create fear in other criminal elements.

For this reason, no law of the country is able to eradicate the root causes of such evils. The problem is that the strayed people neither listen to enlightening things, do not read, spiritual discussions are far away. Their family and social environment is also not sensitive. It is commonly seen that the culprit is straying somewhere in the way of his life, a sharp hip in the heart keeps offering anger in the fire, in the fire of exchange. He should show a right path that can win his trust.

 

Ultimately, it would be inappropriate to say that the elimination of social evils is contained only in the spiritual knowledge only. We are responsible for the sections of the conscious society that contemplate meditating to prevent the spread of the masses around us, But add the lucky ones to yourself to yourself. Gradually introduce them to the importance of spirituality.

Our media workers, filmmakers, people in this direction Can support in unprecedented and individually. Even if we can show the right path to two or four people, then it is enough. There are constraints in every difficult task, it takes time, but the work done with a true mind takes on success. Need is a thought, a sense of humor, an unselfish effort.

Shadow Shrivastava

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